उत्तराखंड के टाइप-1 डायबिटीज बच्चों की आवाज आखिर कौन सुनेगा?
“जब एक 15 साल का बच्चा अस्पताल में अकेला खड़ा होकर अपनी बीमारी के लिए डांट खा रहा हो, तो समस्या सिर्फ उसके HbA1c की नहीं होती—समस्या उस व्यवस्था की होती है जो उसे समझने में विफल रही।”
📍 देहरादून, उत्तराखंड।
📅 30 अक्टूबर 2017—रेखा नेगी के लिए यह तारीख सिर्फ उनकी बीमारी के निदान की तारीख नहीं थी, बल्कि एक ऐसी लड़ाई की शुरुआत थी जिसने पिछले आठ वर्षों में सैकड़ों टाइप-1 डायबिटीज से प्रभावित बच्चों और परिवारों को जोड़ दिया।
चंबा, टिहरी गढ़वाल की रहने वाली रेखा नेगी B.Tech Computer Science और MBA की पढ़ाई कर चुकी हैं। नौकरी के दौरान उन्हें टाइप-1 डायबिटीज के लक्षण दिखाई देने लगे। लेकिन लगभग छह महीने तक उनका सही निदान नहीं हो पाया। इस दौरान उनका करीब 10 किलो वजन कम हो गया और आखिरकार 30 अक्टूबर 2017 को उनकी स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि वे केटोन्स के साथ अस्पताल पहुंचीं और ICU में भर्ती करनी पड़ीं।
लेकिन इस व्यक्तिगत संघर्ष ने उन्हें तोड़ने के बजाय एक सवाल दिया—
❓ “अगर मुझे, एक शिक्षित और जागरूक व्यक्ति को सही diagnosis और diabetes education पाने में इतना संघर्ष करना पड़ा, तो उन बच्चों का क्या होगा जो दूरदराज के पहाड़ी इलाकों में रहते हैं?”
यहीं से एक छोटे से WhatsApp support group की शुरुआत हुई।
अपनी diagnosis के लगभग आठ महीने बाद रेखा ने टाइप-1 डायबिटीज से प्रभावित बच्चों और उनके परिवारों को जोड़ना शुरू किया। वर्ष 2019 में वे मुंबई स्थित Juvenile Diabetes Foundation पहुँचीं, जहाँ उन्हें बेहतर diabetes education, प्रशिक्षण और support system मिला। वहीं उन्होंने तय किया कि उत्तराखंड के बच्चों को भी ऐसा ही multidisciplinary support मिलना चाहिए।

इसी सोच से शुरू हुआ छोटा-सा प्रयास आगे चलकर UDAI Diabetes Awareness Initiative Society बना।
पिछले आठ वर्षों से यह पहल मुख्यतः self-funded तरीके से चलती रही है और टाइप-1 डायबिटीज से प्रभावित बच्चों और परिवारों तक जागरूकता, diabetes education, medical support और अन्य आवश्यक सहायता पहुँचाने का प्रयास करती रही है।
🏥 जब सरकार से मांगा गया एक व्यवस्थित सिस्टम
रेखा नेगी के अनुसार, उत्तराखंड में सरकारी अस्पतालों में टाइप-1 डायबिटीज से प्रभावित बच्चों के लिए इंसुलिन उपलब्ध कराने की दिशा में भी उन्होंने लगातार आवाज उठाई। तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री के समक्ष बच्चों के लिए सरकारी अस्पतालों में इंसुलिन उपलब्ध कराने का मुद्दा रखा गया और इसके बाद राज्य के विभिन्न हिस्सों में इसकी उपलब्धता सुनिश्चित करने की दिशा में काम हुआ।

लेकिन रेखा का कहना था कि सिर्फ इंसुलिन उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं है।
2023 में उन्होंने स्वास्थ्य मंत्री को एक विस्तृत पत्र भेजकर मांग रखी कि—
1️⃣ उत्तराखंड राज्य में टाइप-1 मधुमेह समर्पित रेफरल केंद्र खोलना, जो एक छत के नीचे टाइप 1 डीएम बच्चे की सभी जरूरतों को पूरा करता है।
2️⃣ स्वास्थ्य देखभाल इकाइयों के विभिन्न स्तरों पर समय पर निदान प्रदान करना (जो विशेष रूप से बाल रोग विशेषज्ञों के लिए डॉक्टरों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करके किया जा सकता है)।
3️⃣ मासिक मधुमेह प्रबंधन किट प्रदान करना जिसमें शामिल हैं—ग्लूकोमीटर परीक्षण स्ट्रिप्स, सुई और लैंसेट।
👧🏻 बच्चों को केवल बीमारी के आंकड़े के रूप में नहीं, बल्कि एक पूर्ण व्यक्ति के रूप में देखा जाए।
रेखा के अनुसार, स्वास्थ्य विभाग, NHM और अन्य अधिकारियों के साथ कई बैठकों के बाद राज्य में इस तरह का कार्यक्रम शुरू करने की दिशा में सहमति बनी और MOU की प्रक्रिया आगे बढ़ी।
लेकिन इसके बाद घटनाक्रम ने अचानक एक नया मोड़ लिया।
⚠️ MOU से ठीक पहले बदला पूरा समीकरण
रेखा नेगी का आरोप है कि MOU साइन होने से लगभग एक सप्ताह पहले NHM के NCD विभाग के इस प्रस्तावित कार्यक्रम में Clinton Foundation की एंट्री हुई।
उनके अनुसार, उन्हें पहले से सूचित किए बिना परियोजना को Clinton Foundation के साथ आगे बढ़ाने का निर्णय लिया गया और बाद में दोनों संस्थाओं को मिलकर इसे चलाने की बात कही गई।
रेखा ने शुरुआत में इसे सकारात्मक रूप से लिया।
उनका मानना था कि एक बड़े अंतरराष्ट्रीय संगठन के पास बेहतर resources और expertise हैं और इससे उत्तराखंड के बच्चों को फायदा मिलेगा।
लेकिन उनके अनुसार, जमीनी स्तर पर अनुभव कुछ और रहा।
❓ “क्या बच्चों की जिंदगी data point बनकर रह गई?”
रेखा नेगी और उनके संगठन से जुड़े परिवारों की शिकायतों के अनुसार, कुछ NCD clinics में बच्चों और परिवारों को पर्याप्त diabetes education और emotional support नहीं मिल रहा था।
रेखा का आरोप है कि जिन बच्चों और परिवारों ने advanced diabetes management के बारे में जानकारी हासिल की थी, उन्हें कई बार ऐसी चीजों से हतोत्साहित किया गया, जिससे उनके अनुसार बच्चों के diabetes management पर नकारात्मक असर पड़ा।
उनका यह भी आरोप है कि कार्यक्रम में बच्चों की वास्तविक health outcomes की तुलना में data collection पर अधिक जोर दिखाई दिया।
इन आरोपों की स्वतंत्र जांच और संबंधित पक्षों का आधिकारिक पक्ष इस पूरे मामले को समझने के लिए आवश्यक है।
लेकिन सबसे गंभीर सवाल तब उठा जब रेखा स्वयं एक अस्पताल के NCD clinic में मौजूद थीं।
💔 16.8 HbA1c वाला 15 वर्षीय बच्चा और एक टूटता हुआ भरोसा
रेखा के अनुसार, उन्होंने एक लगभग 15 वर्षीय बच्चे को देखा जिसका HbA1c 16.8% था।
बच्चा अस्पताल में अकेला था।
उनके अनुसार, उसे diabetes management समझाने और उसकी परिस्थितियों को जानने के बजाय clinic में मौजूद लोगों द्वारा डांटा और बेहद असंवेदनशील तरीके से बात की गई।
रेखा कहती हैं कि उस क्षण उन्हें लगा कि यह केवल एक बच्चे की समस्या नहीं है।
“अगर किसी बच्चे का HbA1c 16.8 है, तो सबसे पहले हमें पूछना चाहिए कि वह इतना uncontrolled क्यों है। उसके पास insulin है या नहीं? उसे carbohydrate counting आती है या नहीं? घर में support है या नहीं? उसे hypoglycemia का डर है? स्कूल में क्या हो रहा है? उसकी मानसिक स्थिति कैसी है?”
“उसे शर्मिंदा करने से उसका HbA1c कम नहीं होगा।”
इसी clinic में, उनके अनुसार, उन्होंने एक गर्भवती महिला को भी देखा जिसका blood glucose लगभग 384 mg/dL था।
रेखा के अनुसार, दोनों मामलों में उन्हें लगा कि मरीजों को समझाने, शिक्षित करने और तत्काल उचित clinical guidance देने के बजाय डांटने का तरीका अपनाया जा रहा है।
यही वह क्षण था जब उनका धैर्य टूट गया।
🩸 “Diabetes कोई character certificate नहीं है”
टाइप-1 डायबिटीज एक ऐसी autoimmune condition है जिसमें व्यक्ति को जीवनभर insulin की आवश्यकता होती है।
High HbA1c किसी बच्चे की “गलती” का प्रमाण नहीं है।
यह संकेत है कि कहीं न कहीं उसे अतिरिक्त clinical support, education, insulin access, technology, nutrition guidance, psychological support या परिवार और स्कूल के सहयोग की आवश्यकता हो सकती है।
रेखा नेगी का सवाल सीधा है—
❓ “क्या हम बीमारी से लड़ रहे बच्चों को support करेंगे या उनकी बीमारी के लिए उन्हें दोषी ठहराएंगे?”
उनका कहना है कि UDAI का मूल सिद्धांत यही है कि chronic illness के साथ जी रहे व्यक्ति के साथ सम्मान, संवेदनशीलता और empathy के साथ व्यवहार किया जाना चाहिए।

📢 शिकायतें बढ़ती रहीं, जवाब नहीं आया
रेखा का कहना है कि उन्हें लगातार बच्चों और उनके परिजनों से NCD clinics से जुड़ी शिकायतें मिलती रहीं।
उन्होंने मामले को सोशल मीडिया पर उठाया।
उन्होंने अंतरराष्ट्रीय diabetes organisations और संबंधित authorities को भी अपनी चिंताओं से अवगत कराया।
उनके अनुसार, उन्होंने Clinton Foundation के representatives से कई बार संपर्क करने की कोशिश की—messages भेजे और calls किए—लेकिन उन्हें meeting के लिए पर्याप्त response नहीं मिला।
रेखा का कहना है कि NCD विभाग की ओर से भी Clinton Foundation को उनके साथ बैठक करने के लिए कहा गया, लेकिन इसके बावजूद कोई meaningful meeting नहीं हो सकी।
सबसे बड़ा सवाल उनके लिए यह है कि—
❓ “जब ground पर काम करने वाले लोग लगातार शिकायतें उठा रहे हैं, तो सरकार स्वयं जाकर यह क्यों नहीं देखती कि clinics में वास्तव में क्या हो रहा है?”
⛰️ आठ साल की मेहनत के बाद भी lived experience को जगह क्यों?
रेखा नेगी का कहना है कि वे पिछले आठ वर्षों से उत्तराखंड में टाइप-1 डायबिटीज के बच्चों और परिवारों के साथ जमीन पर काम कर रही हैं।
उनके पास उन परिवारों के अनुभव हैं जो पहाड़ों से insulin और diabetes supplies के लिए संघर्ष करते हैं।
उनके पास उन बच्चों की कहानियाँ हैं जिन्होंने diagnosis के बाद डर, stigma और isolation का सामना किया।
और उनके पास अपनी स्वयं की कहानी है।
फिर भी उनका आरोप है कि राज्य में policy और programme decisions लेते समय उनके जैसे lived-experience advocates और ground-level organisations को पर्याप्त रूप से शामिल नहीं किया गया।
उनका कहना है कि अंतरराष्ट्रीय diabetes मंचों पर उनके grassroots work को पहचान और सम्मान मिलता है, लेकिन अपने ही प्रदेश में policy-level discussions में उनकी आवाज अक्सर अनसुनी रह जाती है।

🤝 यह लड़ाई किसी संस्था के खिलाफ नहीं—बच्चों के अधिकार के लिए है
रेखा स्पष्ट करती हैं कि उनका उद्देश्य किसी organisation को बदनाम करना नहीं है।
उनकी मांग है कि सरकार पूरे programme की स्वतंत्र और पारदर्शी समीक्षा कराए।
यह देखा जाए कि—
1️⃣ NCD clinics में टाइप-1 डायबिटीज के बच्चों को किस प्रकार की diabetes education दी जा रही है।
2️⃣ Clinical outcomes वास्तव में सुधरे हैं या नहीं।
3️⃣ बच्चों और अभिभावकों से मिलने वाली शिकायतों की स्वतंत्र समीक्षा हो।
4️⃣ HbA1c जैसे आंकड़ों को केवल patient-blaming के लिए इस्तेमाल न किया जाए।
5️⃣ Healthcare staff को type-1 diabetes, paediatric diabetes और psychological aspects की उचित training मिले।
6️⃣ Remote और hill districts के बच्चों के लिए insulin और diabetes supplies की uninterrupted availability सुनिश्चित हो।
7️⃣ Diabetes educator, nutritionist/dietitian और psychologist जैसे professionals को care model का हिस्सा बनाया जाए।
8️⃣ Policy-making में people living with diabetes, parents और grassroots organisations को वास्तविक भागीदारी दी जाए।
🏛️ अब सवाल सरकार से है
उत्तराखंड के पहाड़ों में रहने वाला एक बच्चा जब टाइप-1 डायबिटीज के साथ बड़ा होता है, तो उसे सिर्फ insulin नहीं चाहिए।
उसे चाहिए—
📚 सही जानकारी।
👨⚕️ सही डॉक्टर।
🩺 सही diabetes education।
🥗 सही nutrition guidance।
🧠 Mental health support।
👨👩👧 परिवार और स्कूल का सहयोग।
📱 Technology तक पहुंच।
❤️ और सबसे बढ़कर—सम्मान।
क्योंकि 16.8% HbA1c वाला बच्चा असफल बच्चा नहीं है।
वह एक ऐसा बच्चा है जिसे सिस्टम ने शायद पर्याप्त support नहीं दिया।
और यदि कोई 15 वर्षीय बच्चा अस्पताल में अकेला खड़ा है और अपनी बीमारी के लिए डांट खा रहा है, तो हमें उस बच्चे से नहीं—पूरे सिस्टम से सवाल पूछने की जरूरत है।

रेखा नेगी की लड़ाई आज सिर्फ उत्तराखंड के टाइप-1 डायबिटीज बच्चों की लड़ाई नहीं रह गई है।
यह सवाल है कि—
❓ क्या भारत की public healthcare system में chronic illness के साथ जी रहे बच्चों को dignity, empathy और evidence-based care का अधिकार मिलेगा?
❓ क्या government programmes में data से पहले इंसान को देखा जाएगा?
❓ और क्या उन लोगों की आवाज सुनी जाएगी जो वर्षों से ground पर इन बच्चों के साथ खड़े हैं?
रेखा की मांग किसी विशेष व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई नहीं, बल्कि एक independent review, accountability और बेहतर healthcare system की है।
🙏 और अगर आज हम इन बच्चों की आवाज नहीं सुनते, तो कल शायद बहुत देर हो चुकी होगी।