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उत्तराखंड में कुदरत का कोप और गढ़वाली भाषा दिवस की शुभकामनाएँ

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उत्तराखंड की धरती जहां एक ओर अपनी प्राकृतिक सुंदरता, नदियों, पहाड़ों और हरियाली के लिए जानी जाती है, वहीं दूसरी ओर इस साल प्रकृति ने अपना भयावह और रौद्र रूप भी दिखाया। अंधाधुंध विकास, अतिक्रमण और मानवीय हस्तक्षेप ने पहाड़ों और पर्यावरण का संतुलन बिगाड़ दिया है। इसी का परिणाम है कि प्राकृतिक आपदाओं का कहर राज्य में लगातार बढ़ता जा रहा है।

इस वर्ष नदियों ने अपने उफान से कई जगह तबाही मचाई। धाराली (उत्तरकाशी), थराली (चमोली) और आसपास के क्षेत्रों में बादल फटने और बाढ़ जैसी घटनाओं ने लोगों के जीवन को हिला कर रख दिया। कई स्थानों पर सड़कों का अस्तित्व मिट गया, पुल बह गए, मकान जमींदोज हो गए और इंसानों के साथ-साथ पशुओं की भी बड़ी क्षति हुई। पहाड़ की नाजुक संरचना अंधाधुंध कटाई और विकास कार्यों की मार से और कमजोर हो रही है। ऐसे में प्राकृतिक आपदाएँ और भी ज्यादा विनाशकारी रूप ले रही हैं।

यह समय हमें चेतावनी देता है कि अगर हमने प्रकृति के साथ संतुलन नहीं बनाया तो आने वाले सालों में संकट और भी गहरा सकता है। पहाड़ केवल पर्यटन या संसाधनों के लिए नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और अस्तित्व का प्रतीक हैं।

इसी बीच आज 2 सितंबर को गढ़वाली भाषा दिवस मनाया जा रहा है। यह दिन हमें अपनी जड़ों, अपनी बोली और संस्कृति से जुड़े रहने की प्रेरणा देता है। भाषा हमारी पहचान है और गढ़वाली भाषा का संरक्षण और संवर्धन हमारी जिम्मेदारी भी है।

प्रकृति के इस संकट और संस्कृति की इस पहचान के बीच हमें यह संदेश मिलता है कि यदि हमें अपने अस्तित्व को बचाना है तो प्रकृति और संस्कृति—दोनों का सम्मान करना होगा।

✍️ लेखक – सुमन नेगी

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