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इच्छामृत्यु पर ऐतिहासिक फैसला: सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा मामले में पैसिव यूथेनेशिया की दी अनुमति

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नई दिल्ली | The Bharat Pulse

भारत में इच्छामृत्यु (Euthanasia) को लेकर लंबे समय से चल रही कानूनी और नैतिक बहस के बीच Supreme Court of India ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने 11 मार्च 2026 को हरीश राणा नामक व्यक्ति के मामले में पहली बार पैसिव यूथेनेशिया (Passive Euthanasia) की अनुमति दी है।
जस्टिस J. B. Pardiwala और जस्टिस K. V. Viswanathan की बेंच ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि असहनीय पीड़ा में जीवन जी रहे व्यक्ति को “गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार” भी संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा है।

2013 से वेजिटेटिव स्टेट में थे हरीश राणा
32 वर्षीय हरीश राणा वर्ष 2013 से परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट (Permanent Vegetative State) में थे। परिवार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर जीवन रक्षक उपकरण हटाने की अनुमति मांगी थी। अदालत ने मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट और परिवार की सहमति के आधार पर वेंटिलेटर और फीडिंग ट्यूब जैसे लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाने की अनुमति दे दी, जिससे उनकी मृत्यु प्राकृतिक रूप से हो सकेगी।

फैसला सुनाते समय जस्टिस पारदीवाला ने महान नाटककार William Shakespeare के प्रसिद्ध वाक्य “To be or not to be” का उल्लेख करते हुए कहा कि यह निर्णय मानवीय पीड़ा और गरिमा को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।
क्या होता है Euthanasia?

Euthanasia या इच्छामृत्यु का अर्थ है किसी असाध्य बीमारी या असहनीय पीड़ा से गुजर रहे व्यक्ति को दर्द से मुक्ति दिलाने के लिए उसकी मृत्यु होने देना या मृत्यु में सहायता करना। इसे मुख्य रूप से दो प्रकारों में बांटा जाता है:

1. एक्टिव यूथेनेशिया (Active Euthanasia)
इसमें डॉक्टर या कोई व्यक्ति सीधे मौत का कारण बनता है, जैसे लीथल इंजेक्शन देना। भारत में यह पूरी तरह अवैध है और इसे हत्या या culpable homicide की श्रेणी में माना जाता है।

2. पैसिव यूथेनेशिया (Passive Euthanasia)              इसमें मरीज के जीवन को बनाए रखने वाले उपचार जैसे वेंटिलेटर, फीडिंग ट्यूब या दवाएं बंद कर दी जाती हैं, जिससे मृत्यु स्वाभाविक रूप से हो सके। भारत में यह कुछ कड़ी शर्तों के साथ वैध है।
भारत में क्या हैं नियम?

2018 में सुप्रीम कोर्ट ने Common Cause v. Union of India मामले में पैसिव यूथेनेशिया और “लिविंग विल” (Living Will) को मान्यता दी थी। इसके तहत:
मरीज की स्थिति टर्मिनल या अपरिवर्तनीय होनी चाहिए
दो मेडिकल बोर्ड की राय जरूरी
परिवार या लिविंग विल की सहमति
न्यायिक अनुमति (कुछ मामलों में)
2023 में अदालत ने इन प्रक्रियाओं को और सरल बनाने के निर्देश भी दिए थे।
दुनिया में Euthanasia का कानून
दुनिया के कई देशों में इच्छामृत्यु के अलग-अलग कानून हैं।
एक्टिव यूथेनेशिया वैध देशों में
नीदरलैंड्स, बेल्जियम, लक्जमबर्ग, स्पेन, कनाडा, कोलंबिया, न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया के कई राज्य शामिल हैं।
असिस्टेड सुसाइड की अनुमति
स्विट्जरलैंड, जर्मनी, ऑस्ट्रिया और अमेरिका के कई राज्यों में डॉक्टर की सहायता से आत्महत्या (Physician Assisted Suicide) को कानूनी मान्यता मिली है।

भारत में स्थिति
भारत में केवल पैसिव यूथेनेशिया को सीमित परिस्थितियों में अनुमति है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया अभी भी गैरकानूनी है।
समाज में नई बहस
हरीश राणा का यह मामला भारत में पहला ऐसा मामला माना जा रहा है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने 2018 के दिशा-निर्देशों को लागू करते हुए किसी व्यक्ति के लिए पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी है। इससे “राइट टू डाई विद डिग्निटी” को लेकर देश में नई बहस शुरू हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस विषय पर व्यापक और स्पष्ट कानून बनाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया है।
(The Bharat Pulse News Desk)

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