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समाज सेवा की जीती-जागती मिसाल रेखा मजूमदार बडोनी: घर की जिम्मेदारी और समाज की शिक्षा दोनों को बखूबी संभालती महिला

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देहरादून, 6 अप्रैल।

जब देश में शिक्षा का चेहरा एक व्यवसाय के रूप में उभरता जा रहा है और स्कूलों में गुणवत्ता से अधिक ब्रांड वैल्यू और फीस का बोलबाला है, ऐसे समय में देहरादून की रेखा मजूमदार बडोनी एक अनूठी मिसाल बनकर उभरी हैं। उन्होंने न केवल शिक्षा को सेवा का माध्यम बनाया, बल्कि यह भी सिद्ध कर दिया कि परिवार और समाज की जिम्मेदारियां एक साथ निभाई जा सकती हैं।

रेखा मजूमदार बडोनी द्वारा संचालित ‘Lollipops Preschool’ पिछले 16 वर्षों से देहरादून में शिक्षा का एक ऐसा केंद्र बन गया है, जहां बच्चों को सिर्फ ज्ञान ही नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला, नैतिक मूल्य, और आत्मबल भी प्रदान किया जाता है।

यह विद्यालय न तो किसी बड़े ब्रांड का हिस्सा है, न ही किसी सरकारी या गैर-सरकारी संस्था से जुड़ा है। यह पूरी तरह रेखा जी की व्यक्तिगत सोच, संकल्प और सेवा भावना से संचालित होता है। यहां पढ़ने वाले अनेक बच्चे ऐसे हैं जो आर्थिक रूप से बेहद कमजोर परिवारों से आते हैं, लेकिन उनके लिए शिक्षा का द्वार कभी बंद नहीं होता। कई बच्चे यहां पूरी तरह निःशुल्क शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।

शिक्षा: व्यापार नहीं, समाज निर्माण का माध्यम

रेखा जी का मानना है कि शिक्षा को कभी भी व्यापार नहीं बनना चाहिए। शिक्षा का मूल उद्देश्य समाज को बेहतर बनाना है। उनका कहना है:

“अगर आप समाज में बदलाव लाना चाहते हैं, तो शिक्षा सबसे प्रभावी माध्यम है। और अगर आप दिल से किसी काम को करें, तो संसाधनों की कमी भी आड़े नहीं आती।”

उनका यह विचार तब और प्रासंगिक हो जाता है जब आजकल के शिक्षा संस्थान भारी भरकम फीस लेकर बच्चों को केवल परीक्षा पास करने योग्य बना रहे हैं, जीवन जीने योग्य नहीं। लेकिन रेखा जी ने अपने विद्यालय में ऐसी शिक्षा व्यवस्था बनाई है, जहां बच्चों को खेल-खेल में सीखने, सोचने और निर्णय लेने की आज़ादी दी जाती है।

पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ समाज सेवा

रेखा जी एक शिक्षिका ही नहीं, एक पत्नी, मां, बहू और गृहिणी के रूप में भी अपनी जिम्मेदारियों को पूरी निष्ठा से निभाती हैं। उनका दैनिक जीवन एक उदाहरण है कि कैसे एक महिला सीमित संसाधनों में भी समाज के लिए कुछ बड़ा कर सकती है। सुबह बच्चों की देखरेख, दोपहर में स्कूल और शाम को सामाजिक गतिविधियाँ—उनकी दिनचर्या प्रेरणा से भरी है।

उनका यह सफर संघर्षों से भी कम नहीं रहा। उन्हें कई बार लोगों की आलोचना का सामना करना पड़ा, आर्थिक दिक्कतें आईं, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। वो कहती हैं:

“जो लोग खुद कुछ नहीं करते, वो दूसरों के प्रयासों को नीचा दिखाने में लगे रहते हैं। लेकिन अगर आप सही दिशा में चल रहे हैं, तो रुकना नहीं चाहिए।”

रेखा जी बताती हैं कि उन्होंने जब स्कूल की शुरुआत की थी, तब उनके पास कोई बड़ा संसाधन या जगह नहीं थी। किराए पर एक छोटा कमरा लेकर उन्होंने चार बच्चों से शुरू किया। वह खुद बच्चों को पढ़ाती थीं, खाना बनाती थीं, और साफ-सफाई भी करती थीं।

आज वह स्कूल एक छोटे से कैंपस में विस्तारित हो चुका है, लेकिन उनकी सोच और मूल भावना वैसी ही बनी हुई है। वह कहती हैं कि स्कूल के लिए सबसे बड़ी पूंजी प्यार और समर्पण है, जो उन्हें बच्चों से मिलता है।

स्कूल से आगे की सोच: समाज के लिए समर्पण

Lollipops Preschool सिर्फ एक स्कूल नहीं, बल्कि एक सोच है। यहां बच्चों को रटने की शिक्षा नहीं दी जाती, बल्कि जीवन जीने की कला सिखाई जाती है। रेखा जी बच्चों के सर्वांगीण विकास पर ज़ोर देती हैं—भाषा, गणित, कला, नैतिक शिक्षा और सामाजिक व्यवहार सब कुछ पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं। साथ ही वह समय-समय पर बच्चों और उनके अभिभावकों के लिए विशेष वर्कशॉप्स और सामुदायिक कार्यक्रम भी आयोजित करती हैं।

बच्चों में आत्मविश्वास जगाने के लिए हर हफ्ते “स्टोरी टेलिंग सेशन,” “एक्टिविटी डे,” और “कैरक्टर डे” का आयोजन होता है, जिसमें हर बच्चा किसी न किसी रोल में आता है और खुद को व्यक्त करता है। इससे बच्चों को आत्मबल, सामाजिकता और मंच पर बोलने की क्षमता विकसित होती है।

वह यह भी मानती हैं कि हर बच्चे को बराबरी का मौका मिलना चाहिए। इसीलिए उन्होंने स्कूल में ऐसे नियम बनाए हैं जिससे किसी भी बच्चे को उसके आर्थिक या सामाजिक वर्ग के आधार पर भेदभाव का सामना न करना पड़े।

महिलाओं के लिए प्रेरणा स्रोत

रेखा मजूमदार बडोनी सिर्फ बच्चों की शिक्षिका नहीं हैं, बल्कि आज की महिलाओं के लिए एक प्रेरणा स्रोत भी हैं। उन्होंने यह सिद्ध किया है कि अगर एक महिला ठान ले तो वह किसी भी क्षेत्र में सफलता पा सकती है। उन्होंने अनेक बार उन महिलाओं की काउंसलिंग की है जो समाज के दबाव में अपने सपनों को दबा चुकी थीं। वह महिलाओं के लिए स्वरोजगार प्रशिक्षण और शिक्षा से संबंधित कार्यक्रमों का आयोजन भी करती हैं।

रेखा जी मानती हैं कि जब एक महिला शिक्षित होती है, तो पूरा परिवार शिक्षित होता है। और जब वह आत्मनिर्भर बनती है, तो समाज की दिशा बदलती है।

डॉक्यूमेंट्री व सोशल मीडिया पर उपस्थिति

रेखा जी के कार्यों को लेकर अब एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म की भी योजना बनाई जा रही है, जिसमें उनके संघर्ष, प्रेरणा और सेवा के मार्ग को विस्तार से दिखाया जाएगा। यह डॉक्यूमेंट्री न सिर्फ उनके कार्यों का चित्रण होगी, बल्कि उन मूल्यों और विचारों को भी उजागर करेगी जो उन्होंने जीवनभर अपनाए हैं।

सोशल मीडिया पर भी अब उनके विचार, कार्य और अनुभव साझा किए जा रहे हैं, जिससे देशभर की महिलाएं प्रेरित हो सकें। उन्होंने हाल ही में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर ‘Real Education Doesn’t Need a Price Tag’ जैसे अभियान शुरू किए हैं, जिसमें वह दिखा रही हैं कि बिना किसी ब्रांड के भी शिक्षा प्रभावी और परिवर्तनकारी हो सकती है।

रेखा जी के अनुसार,

“वास्तविक शिक्षा वह है जो बिना कीमत लगाए समाज को संवारती है। जब बच्चा स्कूल से कुछ अच्छा सीखकर घर जाता है, और वह व्यवहार में भी नजर आता है, तब शिक्षक का प्रयास सफल होता है।”

बच्चों और अभिभावकों का अनुभव

रेखा जी के स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के अभिभावक कहते हैं कि उनके बच्चों में आत्मविश्वास, अनुशासन और नैतिकता का स्तर अन्य स्कूलों की तुलना में कहीं अधिक है। बच्चों को पढ़ाई के साथ-साथ सामाजिक मूल्यों की भी शिक्षा दी जाती है, जिससे उनका सम्पूर्ण व्यक्तित्व निखरता है।

एक अभिभावक बताते हैं:

“मेरी बेटी जब स्कूल आई थी, तो बहुत डरपोक थी। लेकिन आज वह कविता पढ़ती है, मंच पर बोलती है और दूसरों की मदद करती है। यह बदलाव रेखा मैडम की वजह से आया है।”

प्रेरणा का स्रोत

रेखा मजूमदार बडोनी की कहानी उन लाखों महिलाओं के लिए प्रेरणा है जो सोचती हैं कि परिवार और समाज के बीच संतुलन बनाना मुश्किल है। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि सेवा, शिक्षा और समर्पण अगर जीवन का हिस्सा बन जाएं, तो कोई भी कार्य असंभव नहीं।

उनका जीवन एक आवाज़ है, एक संदेश है, और सबसे बढ़कर एक क्रांति है — जिसमें शिक्षा बिकती नहीं, बल्कि बाँटी जाती है।
वह आने वाली पीढ़ियों को यह बता रही हैं कि सच्चा बदलाव न नारों से आता है, न विज्ञापनों से, बल्कि सच्चे समर्पण और निस्वार्थ सेवा से आता है।

आज रेखा मजूमदार बडोनी सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि एक विचार हैं—जो कहता है कि एक महिला अगर चाहे, तो अकेले भी एक समाज को बदल सकती है।

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