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उत्तराखंड पंचायत चुनाव पर हाईकोर्ट की रोक: आरक्षण प्रक्रिया पर उठे सवाल

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📍 नैनीताल/देहरादून | The Bharat Pulse
उत्तराखंड में प्रस्तावित त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों पर नैनीताल हाईकोर्ट ने तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। यह रोक राज्य सरकार द्वारा आरक्षण नियमावली को लेकर स्थिति स्पष्ट न करने के चलते लगाई गई है। कोर्ट ने चुनावों में आरक्षण रोटेशन प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के बाद यह निर्णय सुनाया।

⚖️ क्या कहा कोर्ट ने?

मुख्य न्यायाधीश जी. नरेंद्र और न्यायमूर्ति आलोक महरा की खंडपीठ ने स्पष्ट कहा कि आरक्षण नियमों को विधिवत रूप से पूरा नहीं किया गया है। कोर्ट ने राज्य सरकार से जवाब तलब करते हुए चुनावी प्रक्रिया पर आदेश स्थगित कर दिया है।

📝 सरकार ने जारी की थी नई नियमावली

सरकार ने 9 जून को त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों के लिए नई आरक्षण नियमावली जारी की थी और 11 जून को एक और आदेश के तहत पुराने आरक्षण रोटेशन को शून्य घोषित कर नई प्रणाली लागू करने की बात कही थी।

📌 याचिकाकर्ता की दलील

गणेश दत्त कांडपाल (बागेश्वर निवासी) और अन्य याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट में दायर याचिका में तर्क दिया कि नई नियमावली के चलते लगातार चौथी बार कुछ सीटों को आरक्षित कर दिया गया है। इससे आम वर्ग के लोग चुनाव लड़ने से वंचित हो रहे हैं, जो कि लोकतांत्रिक अधिकारों का उल्लंघन है।

🚨 अधिसूचना के बावजूद रोक

राज्य निर्वाचन आयोग ने 21 जून को पंचायत चुनावों की अधिसूचना जारी की थी और 23 जून को जिला निर्वाचन अधिकारियों को कार्यक्रम भेजा जाना था। लेकिन उससे पहले ही कोर्ट ने इस पूरे कार्यक्रम पर रोक लगा दी।

🗳️ क्या था चुनाव कार्यक्रम?

राज्य निर्वाचन आयुक्त सुशील कुमार के अनुसार, हरिद्वार को छोड़ बाकी 12 जिलों में चुनाव कराए जाने थे। दो चरणों में होने वाले चुनावों की रूपरेखा इस प्रकार थी:

  • नामांकन: 25-28 जून
  • जांच: 29 जून – 1 जुलाई
  • नाम वापसी: 2 जुलाई
  • पहला चरण मतदान: 10 जुलाई
  • दूसरा चरण मतदान: 15 जुलाई
  • परिणाम: 19 जुलाई

📍 सरकार की चूक पड़ी भारी

कोर्ट ने यह भी कहा कि शुक्रवार को ही राज्य सरकार से स्थिति स्पष्ट करने को कहा गया था, लेकिन सरकार ऐसा करने में विफल रही। बावजूद इसके, सरकार ने चुनाव की अधिसूचना जारी कर दी, जो कि न्यायालय की प्रक्रिया का उल्लंघन माना गया।


🔍 यह मामला न केवल पंचायत चुनावों को प्रभावित कर रहा है, बल्कि ग्रामीण जनप्रतिनिधित्व की पूरी प्रक्रिया पर प्रश्नचिह्न लगा रहा है। अब देखना होगा कि सरकार कोर्ट के समक्ष किस प्रकार अपनी स्थिति स्पष्ट करती है और चुनाव प्रक्रिया को फिर से कैसे पटरी पर लाया जाता है।

 

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