कोंडानकुलाथुर श्री अंजनेय स्वामी मंदिर: तमिलनाडु की गोद में छिपी आस्था का जाग्रत केंद्र
तमिलनाडु के चेन्नई ज़िले से लगभग 35 किलोमीटर दूर कोंडानकुलाथुर गांव में स्थित श्री अंजनेय स्वामी मंदिर एक ऐसा धार्मिक स्थल है, जो स्थानीय श्रद्धालुओं की अपार आस्था का केंद्र है, लेकिन देशभर में बहुत कम जाना गया है।
यह मंदिर विशेष रूप से मंगलवार और हनुमान जयंती जैसे अवसरों पर भक्तों से भरा रहता है। मान्यता है कि यहां स्थापित हनुमान जी की प्रतिमा लगभग 18 फीट ऊंची है, और यह एक विशेष प्रकार की शिला से बनी हुई है।
🛕 विशेषताएं और मान्यताएं
स्थानीय निवासियों के अनुसार, यह प्रतिमा स्वयंभू है — यानी यह किसी मूर्तिकार द्वारा नहीं, बल्कि प्राकृतिक रूप से शिला में उभरी हुई मानी जाती है। ग्रामीणों की मान्यता है कि प्रतिमा की आंखों में ऐसा तेज है कि रात के समय उनमें हल्का प्रकाश दिखाई देता है।
यह मंदिर किसी सरकारी ट्रस्ट या संस्थान द्वारा संचालित नहीं है। गांववाले स्वयं इसकी देखरेख करते हैं, और हर मंगलवार को विशेष पूजा, अभिषेक और प्रसाद वितरण होता है।
📜 जनश्रुतियाँ
ग्रामीणों के अनुसार, यह स्थल कभी ऋषियों और साधकों की तपोभूमि रहा है। मान्यता है कि इस मंदिर में दर्शन करने से मन की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है, और भय, शत्रु बाधा तथा नजर दोष से मुक्ति मिलती है।
हालांकि इन बातों के कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं, लेकिन स्थानीय जनविश्वास इन पर दृढ़ता से कायम है।
🔱 त्यौहार और आयोजन
हनुमान जयंती के दिन यहां सुंदरकांड पाठ, हवन और भंडारे का आयोजन किया जाता है। ग्रामीण लगभग 100 किलो नैवेद्य चढ़ाते हैं, जिसमें चना, गुड़, और बेसन के लड्डू शामिल होते हैं।
इस दिन तमाम श्रद्धालु यहां एकत्र होकर भक्ति भाव में लीन हो जाते हैं। कहा जाता है कि हनुमान जी की विशेष कृपा उन पर बनी रहती है जो मंगलवार को उपवास रखकर यहां दर्शन करते हैं।
🌿 संरक्षित धरोहर या उपेक्षित आस्था?
आज जब देश के बड़े मंदिर तीर्थ और पर्यटन स्थल बन चुके हैं, वहीं कोंडानकुलाथुर श्री अंजनेय स्वामी मंदिर अब भी अपने सरल, शांत, और भक्तिभाव से परिपूर्ण वातावरण के लिए जाना जाता है।
यह मंदिर एक उदाहरण है कि लोक-आस्था और निःस्वार्थ सेवा से ही किसी स्थल की पवित्रता बनी रहती है — भले ही वह प्रचार और पर्यटन से दूर हो।
The Bharat Pulse का उद्देश्य है कि देश के कोने-कोने में छिपे ऐसे पवित्र स्थलों और श्रद्धा के केन्द्रों को सामने लाया जाए, जो हमारी संस्कृति और आस्था की जड़ें हैं।
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