उत्तराखंड को बंगाल–केरल बनाने की साज़िश?
अंकिता भंडारी केस में न्याय के बाद भी सड़कों पर अराजकता, कांग्रेस–वामपंथी राजनीति बेनकाब
नई दिल्ली/देहरादून | The Bharat Pulse | Special Report
देवभूमि उत्तराखंड की शांत पहचान को झकझोरने की कोशिशें एक बार फिर सामने आई हैं। अंकिता भंडारी हत्याकांड में न्यायालय द्वारा दोषियों को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाए जाने के बावजूद जिस तरह कांग्रेस और कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़े संगठनों द्वारा सड़कों पर हिंसा, तोड़फोड़ और डर का माहौल बनाया जा रहा है, उसने एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है—क्या उत्तराखंड को भी पश्चिम बंगाल और केरल की तरह अराजक राजनीति की प्रयोगशाला बनाया जा रहा है?
यह मामला उन गिने-चुने मामलों में से है, जहाँ सरकार, प्रशासन, जांच एजेंसियाँ और न्यायपालिका—सभी ने अपनी जिम्मेदारी निभाई। घटना सामने आते ही आरोपियों की गिरफ्तारी की गई, विशेष जांच दल (SIT) गठित हुआ और जांच की कमान एक वरिष्ठ महिला IPS अधिकारी DIG पी. रेणुका देवी को सौंपी गई, जो वर्तमान में CBI में कार्यरत हैं। यह अपने आप में जांच की गंभीरता और निष्पक्षता को दर्शाता है।
जांच केवल कागज़ों तक सीमित नहीं रही। फॉरेंसिक साक्ष्य, कॉल डिटेल रिकॉर्ड, गवाहों के बयान और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर मजबूत केस तैयार किया गया, जो न्यायालय में पूरी तरह टिक पाया। परिणामस्वरूप, अदालत ने तीनों दोषियों को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई। इसके साथ ही पीड़ित परिवार को आर्थिक मुआवजा, प्रशासनिक सहयोग और एक सदस्य को सरकारी नौकरी का आश्वासन भी दिया गया।
इतना ही नहीं, सरकारी वकील की नियुक्ति भी अंकिता के माता-पिता की इच्छा के अनुसार की गई, ताकि परिवार को न्यायिक प्रक्रिया पर पूरा भरोसा रहे। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने स्वयं अंकिता के पिता से संवाद कर संवेदनाएँ व्यक्त कीं और यह भरोसा दिलाया कि सरकार न्याय के साथ खड़ी है।
इन तमाम तथ्यों के बावजूद, न्याय हो जाने के बाद भी सड़कों पर उग्र प्रदर्शन, सरकारी संपत्ति को नुकसान, मुख्यमंत्री के पोस्टर फाड़ना और आम नागरिकों के घरों पर हमलों जैसी घटनाएँ सामने आना, चिंता का विषय है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह वही कांग्रेस–वामपंथी मॉडल है, जो वर्षों से पश्चिम बंगाल और केरल में देखने को मिला है—जहाँ विरोध के नाम पर हिंसा और राजनीति के नाम पर अराजकता को बढ़ावा दिया जाता रहा है।
सबसे गंभीर पहलू यह है कि अब न्याय व्यवस्था पर सवाल वही लोग उठा रहे हैं, जिनका खुद का रिकॉर्ड संदेहों से घिरा रहा है। जिन व्यक्तियों को न्यायालय ने परवीक्षा पर छोड़ा हो, और जिन पर सहानुभूति बटोरने के लिए कथित रूप से फर्जी हमले कराने के आरोप लगते रहे हों, जब वही लोग अदालतों और जांच एजेंसियों पर भरोसा न होने की बात करते हैं, तो यह केवल सरकार पर नहीं, बल्कि देश की न्यायिक प्रणाली पर सीधा हमला है।
‘VIP’ संलिप्तता को लेकर भी सरकार का रुख शुरू से स्पष्ट रहा है। अब तक की जांच और न्यायालयी कार्यवाही में किसी भी ‘VIP’ की संलिप्तता का कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आया। सरकार ने दो टूक कहा है कि ठोस और न्यायालय-योग्य सबूत होंगे तो कार्रवाई अवश्य होगी, लेकिन अफवाहों, सोशल मीडिया ट्रायल और राजनीतिक दबाव के आधार पर जांच एजेंसी बदलना न्याय के साथ खिलवाड़ होगा—खासकर तब, जब कोर्ट स्वयं उस जांच को मान्यता दे चुका हो।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में सरकार ने साफ संदेश दिया है कि उत्तराखंड में कानून का राज सर्वोपरि है। न्याय सड़कों पर नहीं, अदालतों में होता है। हिंसा, तोड़फोड़ और डर के जरिए राजनीति करने वालों के खिलाफ सख़्त कार्रवाई की जाएगी।
उत्तराखंड की जनता भी अब स्पष्ट रूप से कह रही है—यह देवभूमि है, यहाँ बंगाल–केरल की राजनीति नहीं चलेगी। यहाँ लोकतंत्र, कानून और शांति की परंपरा है, जिसे किसी भी सूरत में कमजोर नहीं होने दिया जाएगा।
उत्तराखंड की बहादुर बेटी अंकिता की आड़ में राजनीतिक अराजकता फैलाने की कोशिशें न केवल अनुचित हैं, बल्कि प्रदेश की शांति और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए खतरा भी हैं। उत्तराखंड को बंगाल–केरल बनाने की किसी भी साज़िश को जनता और कानून—दोनों मिलकर नाकाम करेंगे।