हेमराज बिष्ट: जनता और संगठन के सेवक बनाम स्वार्थी राजनीति के प्रतीक बिशन सिंह चुफाल
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में डीडीहाट विधानसभा क्षेत्र इन दिनों चर्चा का केंद्र बना हुआ है। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के वरिष्ठ विधायक बिशन सिंह चुफाल और खेल परिषद के उपाध्यक्ष व दायित्वधारी हेमराज बिष्ट के बीच टकराव ने न केवल स्थानीय राजनीति में हलचल मचा दी है, बल्कि पार्टी के भीतर युवा और वरिष्ठ नेतृत्व के बीच बढ़ते अंतर्विरोध को भी उजागर किया है।
विवाद की जड़: विकास कार्यों में बाधा का आरोप
बिशन सिंह चुफाल ने हेमराज बिष्ट पर आरोप लगाया कि वे मुख्यमंत्री कार्यालय से स्वीकृत आर्थिक सहायता की फाइलें गायब करवा रहे हैं और विकास कार्यों में बाधा डाल रहे हैं। चुफाल ने यह भी कहा कि बिष्ट को उनके पद से हटाया जाना चाहिए। लेकिन राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह आरोप चुफाल की स्वार्थी राजनीति और सत्ता-लोलुप प्रवृत्ति का नतीजा है।
हेमराज बिष्ट: संघर्ष और समर्पण का प्रतीक
हेमराज बिष्ट का राजनीतिक सफर अनुशासन, संघर्ष और संगठन के प्रति समर्पण से भरा रहा है। वह लंबे समय तक बजरंग दल के प्रांत संयोजक रहे और आरएसएस की शाखाओं में नियमित रूप से भाग लेते रहे। 2010 में घर वापसी के बाद से उन्होंने निरंतर बीजेपी से जुड़ाव बनाए रखा और जनता व संगठन की सेवा में जुटे रहे। गरीब किसान परिवार से आने वाले बिष्ट ने कहा, “मैं जनता और संगठन के लिए काम करता हूं। लेकिन बिशन दा की वजह से मैं डीडीहाट में घुस तक नहीं पाता था। फिर भी मैंने कभी हार नहीं मानी। बिशन दा मेरे गुरु और आदर्श हैं। उनके अनुभव और सम्मान को मैं हमेशा मानता हूं। मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा है।”
चुफाल की पुरानी राजनीति और परिवारवादी स्वार्थ
चुफाल का राजनीतिक इतिहास विवादों से भरा रहा है। उन्होंने पहले भगत सिंह कोश्यारी को मुख्यमंत्री बनने से रोका, बाद में त्रिवेंद्र सिंह रावत के खिलाफ दिल्ली जाकर उन्हें हटाने की कोशिश की, और अब वर्तमान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के विकास कार्यों को रोकने की कोशिश कर रहे हैं।
सत्ताधारी चुफाल पहले ग्राम प्रधान और ब्लॉक प्रमुख रह चुके हैं और छह बार विधायक का अनुभव रखते हैं। राजनीतिक सूत्रों का कहना है कि अब उनका लक्ष्य अपनी बेटी को विधायक बनाना है। इसके चलते वे हेमराज बिष्ट जैसे युवा और ईमानदार नेताओं को दबाकर अपनी सियासी जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।
युवा बनाम वरिष्ठ नेतृत्व
यह विवाद असल में पार्टी के भीतर दो धाराओं का प्रतीक है—एक तरफ हेमराज बिष्ट, जो संघर्ष और सेवा की राजनीति कर रहे हैं और जनता व कार्यकर्ताओं के बीच लोकप्रिय हैं। दूसरी तरफ बिशन सिंह चुफाल, जो व्यक्तिगत स्वार्थ और सत्ता की भूख के लिए संगठन में बाधाएं खड़ी कर रहे हैं।
स्थानीय कार्यकर्ताओं का कहना है कि बिष्ट के कार्यक्रमों में जनता खुलकर आती है, जबकि चुफाल के दबाव के कारण कार्यकर्ताओं में डर और हिचक महसूस होती है।
पार्टी की छवि और भविष्य
डीडीहाट का यह विवाद पार्टी की एकजुटता पर सवाल खड़ा करता है। विश्लेषकों का कहना है कि यदि पार्टी हेमराज बिष्ट जैसे जमीनी नेताओं को आगे नहीं लाती, तो उसकी छवि और चुनावी रणनीति प्रभावित हो सकती है। वहीं, चुफाल जैसी राजनीति पार्टी के विश्वास और संगठनात्मक संतुलन को कमजोर कर सकती है।
निष्कर्ष
डीडीहाट का यह मामला साफ करता है कि जनता और संगठन किसे अपना नेता मानते हैं—एक स्वार्थी और पदलोलुप नेता को या एक संघर्षशील, जनता-केंद्रित और ईमानदार कार्यकर्ता को। संकेत स्पष्ट हैं कि हेमराज बिष्ट जैसे नेता ही बीजेपी का भविष्य हैं, जबकि चुफाल की राजनीति अब केवल व्यक्तिगत स्वार्थ तक सीमित रह गई है।