उत्तराखंड: विकास से भटकती राजनीति और वास्तविक समस्याओं की अनदेखी
लेखिका (मोनिका बिष्ट) – अंतरराष्ट्रीय शिक्षा परामर्शदाता
यह सोचकर अत्यंत दुःख होता है कि उत्तराखंड में वास्तविक विकास के मुद्दों को छोड़कर लोग छोटे-छोटे राजनीतिक और गैर-जरूरी विषयों में उलझे हुए हैं।
पहाड़ और शहर का भेदभाव, मंत्री जी ने विधानसभा सत्र में क्या कहा, उत्तराखंड में 19 जिले हैं या नहीं—ये सब ऐसे विषय हैं जिन पर बहस तो हो रही है, लेकिन ये केवल जनता का ध्यान भटकाने का कार्य कर रहे हैं।
वास्तव में उत्तराखंड का 88 प्रतिशत हिस्सा पहाड़ी क्षेत्र में आता है, लेकिन यहां की शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं और रोजगार के अवसर आज भी बेहद सीमित हैं। उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने का उद्देश्य यही था कि यहां के पर्वतीय क्षेत्रों का समुचित विकास हो, लेकिन पिछले 23 वर्षों में विकास के नाम पर केवल राजनीतिक ड्रामा और जनता की भावनाओं से खिलवाड़ हुआ है।
उत्तराखंड राज्य बनने का संघर्ष और अनदेखी हुई प्राथमिकताएं
उत्तराखंड राज्य बनने से पहले यह उत्तर प्रदेश का हिस्सा था, और तब यहां के पहाड़ी इलाकों की उपेक्षा लगातार की जा रही थी। इस अन्याय के खिलाफ कई आंदोलन हुए और हमारे संघर्षशील आंदोलनकारियों के बलिदान के बाद 9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड का गठन हुआ। इस नए राज्य के निर्माण का मूल उद्देश्य पर्वतीय क्षेत्रों के विकास को गति देना था, लेकिन आज की स्थिति देखकर लगता है कि यह उद्देश्य कहीं न कहीं खो गया है।
आज भी, पहाड़ों में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पानी और बिजली जैसी मूलभूत सुविधाएं अधूरी हैं, जिसके कारण लोग पलायन करने को मजबूर हैं।
शिक्षा प्रणाली की कमजोर स्थिति
आज के समय में बेहतर रोजगार पाने और निजी क्षेत्र में अवसर प्राप्त करने के लिए अंग्रेजी भाषा का ज्ञान अनिवार्य हो गया है।
- सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में याचिकाएं अंग्रेजी में ही दाखिल की जाती हैं।
- अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय कंपनियों में अच्छी नौकरी पाने के लिए भी अंग्रेजी बहुत आवश्यक है।
- लेकिन उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों में छठी कक्षा के बाद ही अंग्रेजी पढ़ाई जाती है, जिससे यहां के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे प्रतियोगी परीक्षाओं और निजी क्षेत्र में पीछे रह जाते हैं।
इसी कारण, अधिकतर युवा सरकारी नौकरियों के भरोसे बैठे रहते हैं, लेकिन वहां भी राजनीति और भ्रष्टाचार इतना हावी है कि योग्य उम्मीदवारों को नौकरियां नहीं मिलतीं। नेताओं और अधिकारियों के रिश्तेदारों को विशेष लाभ दिया जाता है, जिससे आम युवाओं के लिए मौके सीमित हो जाते हैं।
रोजगार और व्यवसाय में चुनौतियां
उत्तराखंड को एक पर्यटन स्थल माना जाता है, लेकिन यहां के लोग खुद पर्यटन व्यवसाय में ज्यादा सक्रिय नहीं हैं।
- ज्यादातर होटलों, रिसॉर्ट्स और जमीनों पर बाहरी लोगों का कब्जा हो गया है, जबकि उत्तराखंड के लोग रोजगार और आजीविका के अभाव में बड़े शहरों और विदेशों में बसने को मजबूर हैं।
- जो लोग देहरादून और ऋषिकेश के प्राइवेट स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ रहे हैं, उन्हें भी अंततः जॉब के लिए दूसरे शहरों की ओर जाना पड़ता है, क्योंकि उत्तराखंड में कंपनियां और इंडस्ट्रीज नहीं हैं।
- बड़ी कंपनियां तभी उत्तराखंड में आएंगी, जब यहां की राजनीति विकास केंद्रित होगी और सरकार निजी निवेश को प्रोत्साहित करेगी।
स्वास्थ्य सेवाओं की खराब स्थिति
उत्तराखंड में चिकित्सा सुविधाएं अभी भी बेहद कमजोर हैं।
- पहाड़ी इलाकों में अस्पतालों और डॉक्टरों की भारी कमी है।
- कई बार, गर्भवती महिलाओं को प्रसव के दौरान सड़क पर ही दम तोड़ना पड़ता है, क्योंकि अस्पताल बहुत दूर हैं।
- कई मरीज समय पर इलाज न मिलने के कारण रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं।
- एम्बुलेंस सेवाएं और स्वास्थ्य केंद्रों की उपलब्धता में सुधार की सख्त जरूरत है।
अगर राज्य सरकार वास्तव में उत्तराखंड के लोगों की चिंता करती है, तो उसे स्वास्थ्य सेवाओं के बुनियादी ढांचे में निवेश करना चाहिए और नई तकनीकों को अपनाकर पहाड़ों में आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध करानी चाहिए।
आधुनिक युग में बदलाव की जरूरत
अगर उत्तराखंड को सच में एक विकसित राज्य बनाना है, तो सबसे पहले शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को आधुनिक बनाना जरूरी है।
- जब तक हमारे पास शिक्षित और स्वस्थ युवा नहीं होंगे, तब तक राज्य आगे नहीं बढ़ सकता।
- हमें ऐसी शिक्षा प्रणाली विकसित करनी होगी, जो युवाओं को सरकारी नौकरी के भरोसे बैठने की बजाय नए उद्यमों और निजी क्षेत्र में करियर बनाने के लिए प्रेरित करे।
- स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार लाकर, हर व्यक्ति को बिना भेदभाव के अच्छा इलाज उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
संस्कृति और परंपराओं पर खतरा
उत्तराखंड के लोग अपनी संस्कृति और परंपराओं से गहरा लगाव रखते हैं। लेकिन हाल ही में कुछ नए कानून लागू किए गए हैं, जो हमारी सांस्कृतिक विरासत को नुकसान पहुंचा रहे हैं।
- राजनीति और सरकारी नीतियों को इस तरह बदला जा रहा है कि स्थानीय परंपराओं पर सीधा असर पड़ रहा है।
- अगर सरकार नए कानून बनाना चाहती है, तो उसे संस्कृति को बचाने के बजाय राज्य के विकास के लिए नए कानून बनाने चाहिए।
उत्तराखंड के उज्जवल भविष्य के लिए क्या करना होगा?
अगर हमें उत्तराखंड को वास्तव में एक विकसित और आत्मनिर्भर राज्य बनाना है, तो कुछ ठोस कदम उठाने होंगे—
- शिक्षा प्रणाली को आधुनिक बनाना – अंग्रेजी भाषा और टेक्नोलॉजी आधारित शिक्षा को बढ़ावा देना।
- स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार – हर गांव और कस्बे में अस्पताल और डॉक्टरों की उपलब्धता सुनिश्चित करना।
- रोजगार के अवसर बढ़ाना – सरकारी नौकरियों से हटकर निजी क्षेत्र और उद्यमशीलता को बढ़ावा देना।
- स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा देना – टूरिज्म, कृषि, और अन्य उद्योगों में स्थानीय लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करना।
- संस्कृति और परंपराओं की रक्षा – बाहरी प्रभावों से बचाकर हमारी सांस्कृतिक विरासत को बनाए रखना।
- बड़े शहरों पर निर्भरता कम करना – स्थानीय स्तर पर आर्थिक अवसर बढ़ाना, ताकि लोग पलायन करने को मजबूर न हों।
उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने का उद्देश्य केवल राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए नहीं था। यह राज्य इसलिए बना था ताकि यहां के लोगों को अच्छी शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं और रोजगार के पर्याप्त अवसर मिल सकें।
लेकिन आज, राजनीति केवल जातिवाद, क्षेत्रवाद, और छोटे-छोटे मुद्दों तक सिमट गई है। अगर हमें वास्तव में उत्तराखंड को आगे ले जाना है, तो हमें राजनीति से ऊपर उठकर विकास पर ध्यान देना होगा।
युवा शक्ति को आगे आकर उत्तराखंड के विकास के लिए ठोस कदम उठाने होंगे, तभी यह राज्य अपनी असली पहचान और उद्देश्य को प्राप्त कर पाएगा।
(यह लेखिका के अपने निजी विचार है, इसे the Bharat pulse के आधिकारिक बयान न समझा जाए)
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